Jaap Each Shloka 7 Times

भक्तामर- प्रणत- मौलिमणि – प्रभाणां

मुद्योतकम् – दलितपाप- तमोवितानम्।

सम्यक्-प्रणम्य- जिनपाद- युगम्- युगादा-

वालम्बनम्-भवजले- पतताम्-जनानाम्॥१॥ 

 

BHAKTAMAR PRANATA MAULI MANI PRABHANA

MUDDYOTAKAM DALIT PAAP TAMO VITANAM

SAMYAK PRANAMYA JINAPAD YUGAM YUGADA

VALAMBANAM BHAVAJALÉ PATATAM JANANAM

अर्थ :
झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले, पाप रुपी अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले, कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार समुन्द्र में डूबते हुए प्राणियों के लिये आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव के चरण युगल को मन वचन कार्य से प्रणाम करके (मैं मुनि मानतुंग उनकी स्तुति करूँगा)|


यः संस्तुतः सकल वाङ्मय तत्वबोधा- ।

दुद्भूतबुद्धिपटुभिः सुरलोकनाथैः ॥

स्तोत्रैर्जगत्रितय चित्त हरैरुदारैः ।

स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥२॥ 


YAH SANSTUTAH SAKALA VANMAYA TATTVABODHA

DUDBHOOTA BUDDHI PATUBHIH SURLOKA NATHAIH

STROTRAIR JAGATTRITAYA CHITTA HARAI RUDARAIH

STOSHAIY KILAHAMAPITAM PRATHAMAM JINENDRAM

अर्थ :
सम्पूर्णश्रुतज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि की कुशलता से इन्द्रों के द्वारा तीन लोक के मन को हरने वाले, गंभीर स्तोत्रों के द्वारा जिनकी स्तुति की गई है उन आदिनाथ जिनेन्द्र की निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी स्तुति करूँगा|

बुद्ध्या विनाऽपि विबुधार्चित पादपीठ ।

स्तोतुं समुद्यत मतिर्विगतत्रपोऽहम् ॥

बालं विहाय जलसंस्थितमिन्दु बिम्ब ।

मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥ 


BUDDHYA VINAPI VIBUDHARCHITA PADAPEETHA

STOTUM SAMUDHYATA MATIRVIGATA TRAPO’HAM

BALAM VIHAYA JALA SANSTHITA MINDU BIMBA

MANYAH KA ICHCHHATI JANAH SAHASA GRAHITUM

अर्थ :
देवों के द्वारा पूजित हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे जिनेन्द्र मैं बुद्धि रहित होते हुए भी निर्लज्ज होकर स्तुति करने के लिये तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल में स्थित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को बालक को छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य सहसा पकड़ने की इच्छा करेगा? अर्थात् कोई नहीं|

कल्पांतकाल पवनोद्धत वह्निकल्पं ।

दावानलं ज्वलितमुज्जवलमुत्स्फुलिंगम् ॥

विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं । 

त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम् ॥४०॥ 


Kalpanta-kala-pawanoddhata-vanhi-kalpam

Dawanalam jwalita-mujjwala-mutsphulingam |

Vishwam jighatsumiwa sammukha-mapatantam

Twan-nama-kirtana-jalam shamayatya-shésham

अर्थ :
आपके नाम यशोगानरुपी जल, प्रलयकाल की वायु से उद्धत, प्रचण्ड अग्नि के समान प्रज्वलित, उज्ज्वल चिनगारियों से युक्त, संसार को भक्षण करने की इच्छा रखने वाले की तरह सामने आती हुई वन की अग्नि को पूर्ण रुप से बुझा देता है|

रक्तेक्षणं समदकोकिल कण्ठनीलं ।

क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम् ॥

आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंकस् । 

त्वन्नाम नागदमनी हृदि यस्य पुंसः ॥४१॥  


raktekshanam samadakokila – kanthanilam,

krodhod dhatam phanina mutphana mapa tantam |

akramati kramayugena nirastashankas –

tvannama nagadamani hridi yasya punsah

अर्थ :
जिस पुरुष के ह्रदय में नामरुपी-नागदौन नामक औषध मौजूद है, वह पुरुष लाल लाल आँखो वाले, मदयुक्त कोयल के कण्ठ की तरह काले, क्रोध से उद्धत और ऊपर को फण उठाये हुए, सामने आते हुए सर्प को निश्शंक होकर दोनों पैरो से लाँघ जाता है|

वल्गत्तुरंग गजगर्जित भीमनाद ।

माजौ बलं बलवतामपि भूपतिनाम्! ॥

उद्यद्दिवाकर मयूख शिखापविद्धं ।

त्वत्- कीर्तनात् तम इवाशु भिदामुपैति ॥४२॥  

अर्थ :
आपके यशोगान से युद्धक्षेत्र में उछलते हुए घोडे़ और हाथियों की गर्जना से उत्पन भयंकर कोलाहल से युक्त पराक्रमी राजाओं की भी सेना, उगते हुए सूर्य किरणों की शिखा से वेधे गये अंधकार की तरह शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाती है|

इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र ।

धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य ॥

यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा । 

तादृक् कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि ॥३७॥ 


ITTHAM YATHA TAWA VIBHUTIRBHU-JJINÉNDRA

DHARMOPADESHNA-WIDHAU NA TATHA PARASYA

YADRIK PRABHA DINAKRITAH PRAHATANDHAKARA

TADRIKKUTOGRAHAGANASYA VIKASHINO’PI

अर्थ :
हे जिनेन्द्र! इस प्रकार धर्मोपदेश के कार्य में जैसा आपका ऐश्वर्य था वैसा अन्य किसी का नही हुआ| अंधकार को नष्ट करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी अन्य प्रकाशमान भी ग्रहों की कैसे हो सकती है?

श्च्योतन्मदाविलविलोल कपोलमूल ।

मत्तभ्रमद् भ्रमरनाद विवृद्धकोपम् ॥

ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं ।

दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ॥३८॥ 


Shchyotan-madawila-wilola kapola-mula,

Matta-bhramad-bhramarnada-vvrichhdkopam |

Airavatabhamibha-mudhdata-mapatantam

Drishtwa bhayam bhavati no bhawada-shritanam

अर्थ :
आपके आश्रित मनुष्यों को, झरते हुए मद जल से जिसके गण्डस्थल मलीन, कलुषित तथा चंचल हो रहे है और उन पर उन्मत्त होकर मंडराते हुए काले रंग के भौरे अपने गुजंन से क्रोध बढा़ रहे हों ऐसे ऐरावत की तरह उद्दण्ड, सामने आते हुए हाथी को देखकर भी भय नहीं होता|

भिन्नेभ कुम्भ गलदुज्जवल शोणिताक्त ।

मुक्ताफल प्रकर भूषित भुमिभागः ॥

बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि । 

नाक्रामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते ॥३९॥ 

Bhinnébha-kumbha galadujjwala -shonitakta

Muktaphala-prakara-bhushita-bhumibhagah |

Baddhakramah-kramagatam harinadhipopih

Nakramati kramayugachala-samshritam té

अर्थ :
सिंह, जिसने हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण कर, गिरते हुए उज्ज्वल तथा रक्तमिश्रित गजमुक्ताओं से पृथ्वी तल को विभूषित कर दिया है तथा जो छलांग मारने के लिये तैयार है वह भी अपने पैरों के पास आये हुए ऐसे पुरुष पर आक्रमण नहीं करता जिसने आपके चरण युगल रुप पर्वत का आश्रय ले रखा है|

शुम्भत्प्रभावलय भूरिविभा विभोस्ते ।

लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती ॥

प्रोद्यद् दिवाकर निरन्तर भूरिसंख्या ।

दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम सौम्याम् ॥३४॥ 


SHUMBHATPRABHA-VALAYA-BHURI-VIBHA VIBHOSTE

LOKA-TRAYE-DYUTIMATAM-DYUTIMAKSHIPANTI

PRODYADDIWAKARA-NIRANTARA-BHURI-SANKHYA-

DIPATYA-JAYATYAPI-NISHAMAPI-SOMA-SAUMYAM

अर्थ :
हे प्रभो! तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की प्रभा को तिरस्कृत करती हुई आपके मनोहर भामण्डल की विशाल कान्ति एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कान्ति से युक्त होकर भी चन्द्रमा से शोभित रात्रि को भी जीत रही है|

स्वर्गापवर्गगममार्ग विमार्गणेष्टः ।

सद्धर्मतत्वकथनैक पटुस्त्रिलोक्याः ॥

दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसत्व ।

भाषास्वभाव परिणामगुणैः प्रयोज्यः ॥३५॥ 

अर्थ :
आपकी दिव्यध्वनि स्वर्ग और मोक्षमार्ग की खोज में साधक, तीन लोक के जीवों को समीचीन धर्म का कथन करने में समर्थ, स्पष्ट अर्थ वाली, समस्त भाषाओं में परिवर्तित करने वाले स्वाभाविक गुण से सहित होती है|

उन्निद्रहेम नवपंकज पुंजकान्ती ।

पर्युल्लसन्नखमयूख शिखाभिरामौ ॥

पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र! धत्तः ।

पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति ॥३६॥ 


UNNIDRA-HEMA-NAWA-PANKAJA-PUNJA-KANTI-

PARYULLASAN-NAKHA-MYUKHA-SHIKHA-BHIRAMAU

PADAU PADANI TAVA YATRA JINENDRA! DHATTAH

PADMANI TATRA VIBUDHAHPARIKALPAYANTI

अर्थ :
पुष्पित नव स्वर्ण कमलों के समान शोभायमान नखों की किरण प्रभा से सुन्दर आपके चरण जहाँ पड़ते हैं वहाँ देव गण स्वर्ण कमल रच देते हैं|

छत्रत्रयं तव विभाति शशांककान्त ।

मुच्चैः स्थितं स्थगित भानुकर प्रतापम् ॥

मुक्ताफल प्रकरजाल विवृद्धशोभं ।

प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥३१॥ 


CHHATRA-TRAYAM TAWA VIBHAI SHASHANK-KANTA-

MUCHCHAIH STITHAM STHAGITA-BHANUKARA-PRATAPAM

MUKTAPHALA-PRAKARA-JALAVIVRIDHA-SHOBHAM

PRAKHYAPAYAT-TRIJAGATAH PARAMÉSHWARATWAM

अर्थ :
चन्द्रमा के समान सुन्दर, सूर्य की किरणों के सन्ताप को रोकने वाले, तथा मोतियों के समूहों से बढ़ती हुई शोभा को धारण करने वाले, आपके ऊपर स्थित तीन छत्र, मानो आपके तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं|

गम्भीरतारवपूरित दिग्विभागस् ।

त्रैलोक्यलोक शुभसंगम भूतिदक्षः ॥

सद्धर्मराजजयघोषण घोषकः सन् ।

खे दुन्दुभिर्ध्वनति ते यशसः प्रवादी ॥३२॥ 


GAMBHIR-TAR-RAVA-PURIT- DIGWABHAGA-

STRAILOKYA-LOKA-SHUBHA-SANGAMA-BHUTI-DAKSHAH

SADDHARMARAJA JAYAGHOSHANAGHOSHAKAH SAN

KHÉ DUNDUBHIRDHWANATI TÉ YASHASAH PRAWADI

अर्थ :
गम्भीर और उच्च शब्द से दिशाओं को गुञ्जायमान करने वाला, तीन लोक के जीवों को शुभ विभूति प्राप्त कराने में समर्थ और समीचीन जैन धर्म के स्वामी की जय घोषणा करने वाला दुन्दुभि वाद्य आपके यश का गान करता हुआ आकाश में शब्द करता है|

मन्दार सुन्दरनमेरू सुपारिजात ।

सन्तानकादिकुसुमोत्कर- वृष्टिरुद्धा ॥

गन्धोदबिन्दु शुभमन्द मरुत्प्रपाता ।

दिव्या दिवः पतित ते वचसां ततिर्वा ॥३३॥ 


MANDARA SUNDARA NAMÉRU SUPARIJATA

SANTANAKA DIKUSUMOTKAR VRISHTI RUDDHA

GANDHODABINDU SHUBHAMANDA MARUTPRAPATA

DIVYA DIVAH PATATI TÉ VACHASAM TATIRWA

अर्थ :
सुगंधित जल बिन्दुओं और मन्द सुगन्धित वायु के साथ गिरने वाले श्रेष्ठ मनोहर मन्दार, सुन्दर, नमेरु, पारिजात, सन्तानक आदि कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आपके वचनों की पंक्तियों की तरह आकाश से होती है|

उच्चैरशोक तरुसंश्रितमुन्मयूख ।

माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् ॥

स्पष्टोल्लसत्किरणमस्त तमोवितानं ।

बिम्बं रवेरिव पयोधर पार्श्ववर्ति ॥२८॥ 


UCHCHAI-RASHOKA-TARU SAMSHRITA-MUMAYUKHA-

MABHATI RUPA-MAMALAM BHAVATO NITANATAM

SPASHTOLLA SATKIRANA MASTA TA MOVITANAM

BIMBAM RAVE-RIVA PAYODHARA-PARSHWAWARTI

अर्थ :
ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे स्थित, उन्नत किरणों वाला, आपका उज्ज्वल रुप जो स्पष्ट रुप से शोभायमान किरणों से युक्त है, अंधकार समूह के नाशक, मेघों के निकट स्थित सूर्य बिम्ब की तरह अत्यन्त शोभित होता है |


सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे ।

विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् ॥

बिम्बं वियद्विलसदंशुलता वितानं ।

तुंगोदयाद्रि शिरसीव सहस्त्ररश्मेः ॥२९॥ 


SINHASANE MANI-MAYUKHA-SHIKHA-VICHITRE

VIBHRAJATÉ TAWA VAPUH KANAKAWADATAM

BIMBAM VIYAD-WILASA-DAMSHU-LATA-VITANAM

TUNGODAYADRI-SHIRSIVA SAHASRARASHMÉH



अर्थ :
मणियों की किरण-ज्योति से सुशोभित सिंहासन पर, आपका सुवर्ण कि तरह उज्ज्वल शरीर, उदयाचल के उच्च शिखर पर आकाश में शोभित, किरण रुप लताओं के समूह वाले सूर्य मण्डल की तरह शोभायमान हो रहा है|

कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,

विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कांतम् ।

उद्यच्छशांक-शुचि-निर्झर-वारि-धार-

मुच्चैस्तटं सुर-गिरेरिव शात-कौम्भम् ॥30॥

 भावार्थ :
चौसट चामरोसे ढुरता आपका तप्त सुवर्ण के वर्ण का शरीर सुमेरु पर्वत के उस स्वर्णमयी तट के समान सुशोभित प्रतीत हो रहा है, जिसपर चंद्रमा के कांतिके समान उज्ज्वल झरनेके शुभ्र और स्वच्छ जल कि धारा बह रही हो। अर्थात आपके इस प्रातिहार्य चवरोंसे मानो आपके उपर एक शुभ्र जल प्रपात ढुर रहा प्रतित होता है।

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित बुद्धि बोधात् ।

त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रय शंकरत्वात् ॥

धाताऽसि धीर! शिवमार्ग विधेर्विधानात् ।

व्यक्तं त्वमेव भगवन्! पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥ 


BUDDHA-STWAMEWA VIBUDHARCHITA-BUDDHIBODHAT

TWAM SHANKARO’SI BHUWANA-TRAYA SHANKARA-TWAT

DHATASI DHIR! SHIVAMARGA-VIDHERVIDHANAT

VYAKTAM TWAMEYA BHAGAWAN PURUSHOTTAMAMOSI

अर्थ :
देव अथवा विद्वानों के द्वारा पूजित ज्ञान वाले होने से आप ही बुद्ध हैं| तीनों लोकों में शान्ति करने के कारण आप ही शंकर हैं| हे धीर! मोक्षमार्ग की विधि के करने वाले होने से आप ही ब्रह्मा हैं| और हे स्वामिन्! आप ही स्पष्ट रुप से मनुष्यों में उत्तम अथवा नारायण हैं |

तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ ।

तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय ॥

तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय ।

तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि शोषणाय ॥२६॥ 


TUBHYAM NAMASTRI BHUVANARTI HARAYA NATHA

TUBHYAM NAMAH KSHITI TALAMALA BHUSHANAYA

TYBHYAM NAMASTRI JAGATAH PARAMESHWARAYA

TUBHYAM NAMO JINA BHAVODADHISHOSHANAYA

अर्थ :
हे स्वामिन्! तीनों लोकों के दुःख को हरने वाले आपको नमस्कार हो, प्रथ्वीतल के निर्मल आभुषण स्वरुप आपको नमस्कार हो, तीनों जगत् के परमेश्वर आपको नमस्कार हो और संसार समुन्द्र को सुखा देने वाले आपको नमस्कार हो| 


को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैस् ।

त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश! ॥

दोषैरूपात्त विविधाश्रय जातगर्वैः ।

स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥२७॥ 


KO VISMAYO’TRA YADI NAMA-GUNAIRASHÉSHAI

TAVM SAMSHRITO NIRVAKASHATAYA MUNISHA!

DOSHAIRUPATTA-VIVIDHASHRAYA-JATAGARVAIH

SWAPNANTAREPI NA KADACHIDI-PIKSHITOSI

अर्थ :
हे मुनीश! अन्यत्र स्थान न मिलने के कारण समस्त गुणों ने यदि आपका आश्रय लिया हो तो तथा अन्यत्र अनेक आधारों को प्राप्त होने से अहंकार को प्राप्त दोषों ने कभी स्वप्न में भी आपको न देखा हो तो इसमें क्या आश्चर्य?

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान् ।

नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ॥

सर्वा दिशो दधति भानि सहस्त्ररश्मिं ।

प्राच्येव दिग् जनयति स्फुरदंशुजालं ॥२२॥ 


STRINAM SHATANI SHATASHO JANAYANTI PUTRAN

NANYA SUTAM TWADUPAM JANANI PRASUTA

SARVA DISHO DADHATI BHANI SAHASA RASHMIM

PRACHAYAYÉVA DIGJANAYATI SPHURADANSHUJALAM

अर्थ :
सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, परन्तु आप जैसे पुत्र को दूसरी माँ उत्पन्न नहीं कर सकी| नक्षत्रों को सभी दिशायें धारण करती हैं परन्तु कान्तिमान् किरण समूह से युक्त सूर्य को पूर्व दिशा ही जन्म देती हैं |

त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस ।

मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् ॥

त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्युं ।

नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः ॥२३॥ 


TWA-MAMANATI MUNAYAH PARAMAM PUMANSA

MADITYA-WARNA-MAMALAM TAMASAH PURASTATA

TWAMEVA SAMYAGUPALABHYA JAYANTI MRITYUM

NANYAH SHIVAH SHIVAPADASYA MUNINDRA! PANTHAH


अर्थ :
हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन आपको सूर्य की तरह तेजस्वी निर्मल और मोहान्धकार से परे रहने वाले परम पुरुष मानते हैं | वे आपको ही अच्छी तरह से प्राप्त कर म्रत्यु को जीतते हैं | इसके सिवाय मोक्षपद का दूसरा अच्छा रास्ता नहीं है

त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं ।

ब्रह्माणमीश्वरम् अनंतमनंगकेतुम् ॥

योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं ।

ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥२४॥ 


TWAMAVYAYAM VIBHU MACHINTYAMA SANKHYAMADYAM-

BRAHMANAMISHWARA MANATA MANAGAKETUM

YOGISHWARAM VIDITA-YOGA-MANEKA-MÉKAM

GYAASWARUPAMAMALAM PRAVADANTI SANTAH


अर्थ :
सज्जन पुरुष आपको शाश्वत, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आद्य, ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु, योगीश्वर, विदितयोग, अनेक, एक ज्ञानस्वरुप और अमल कहते हैं |

वक्तुं गुणान् गुणसमुद्र शशाङ्क्कान्तान् ।

कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्ध्या ॥

कल्पान्त काल् पवनोद्धत नक्रचक्रं ।

को वा तरीतु मलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ॥४॥ 


VAKTUM GUNAN GUNA SAMUDRA SHASHANKANTAN

KASTE KSAMAH SURAGURU PRATIMOPI BUDDHYA

KALPANTA KAL PAVANODHAT NAKRACHAKRAM

KO VA TARITU MALAMAMBUNIDHIM BHUJABHYAM


अर्थ :
हे गुणों के भंडार! आपके चन्द्रमा के समान सुन्दर गुणों को कहने लिये ब्रहस्पति के सद्रश भी कौन पुरुष समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं| अथवा प्रलयकाल की वायु के द्वारा प्रचण्ड है मगरमच्छों का समूह जिसमें ऐसे समुद्र को भुजाओं के द्वारा तैरने के लिए कौन समर्थ है अर्थात् कोई नहीं|

सोऽहं तथापि तव भक्ति वशान्मुनीश ।

कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः ॥

प्रीत्यऽऽत्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं ।

नाभ्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥५॥ 


SOHAM TATHAPI TAV BHAKTI-VASHAN-MUNISHA

KARTUM STAVAM VIGATA-SHAKTI-RAPI PRAVRITTAH

PRITYATMA-VIRYA MAVICHARYA MRIGO MRIGENDRAM

NABHYÉTI KIM NIJASHISHOH PARIPALANARTHANM

अर्थ :
हे मुनीश! तथापि-शक्ति रहित होता हुआ भी, मैं- अल्पज्ञ, भक्तिवश, आपकी स्तुति करने को तैयार हुआ हूँ| हरिणि, अपनी शक्ति का विचार न कर, प्रीतिवश अपने शिशु की रक्षा के लिये, क्या सिंह के सामने नहीं जाती? अर्थात जाती हैं|
भावार्थ :

अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम् ।

त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् ॥

यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति ।

तच्चारुचूत कलिकानिकरैकहेतु ॥६॥ 


ALPASHRUTAM SHRUTAWATAM PARIHASADHAM

TVADBHAKTIREVA MUKHARIKURUTE BALANMAM

YATKOKILAH KILA MADHAU MADHURAM VIRAUTI

TACHCHAMRACHARU KALIKA NIKARAIKA HETUH

अर्थ :
विद्वानों की हँसी के पात्र, मुझ अल्पज्ञानी को आपकी भक्ति ही बोलने को विवश करती हैं| बसन्त ऋतु में कोयल जो मधुर शब्द करती है उसमें निश्चय से आम्र कलिका ही एक मात्र कारण हैं|